लम्हे January 1, 2007
Posted by silentEcho in Rhyme junction.trackback
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गुज़ारने से पहले गुज़र गए, लौट कर आने से मुकर गए ।
दस्तक देकर बुलाया मुझे, कभी हँसाया कभी रुलाया मुझे ॥
रात फर्श पर बिखर गए, सय्यारों से अर्श पर निखर गए ।
बुहार कर कोने मे रखा, जाने कितना वक्त सोने मे लगा ॥
सुबह गीली करवटों पर दिखे, मेरे दिल में सोज़ हो गए ।
चेहरे कि सलवटों पर दिखे, मेरे तुज़ुक-ए-रोज़ हो गये ॥
अब शाम-ए-गुर्बत है यारों, कुछ तन्हाई सी पाई जाती है ।
प्याले के टूटे टुकडों में, उनकी परछाई सी पाई जाती है ॥
कैसे रोकें आँखों में उन्हें, खारे पानी से बह जाते हैं यूँही ।
थम जाएँ तो साँस लें ‘गाफिल’, बरंगे-हवा उड जाते हैं यूँही॥
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