सुबह हो रही… October 5, 2006
Posted by silentEcho in Rhyme junction.trackback
सावन के झूले झूल चुका माँ,
मै सलीब पर झूलूँगा अब।
तेरी गोद में सोता था अब तक,
तेरी गोद में सोऊँगा अब।
मौत किसे कहते है माँ?
मैं जाऊँगा अब जीने को।
विचित्र है तू,दुख करती है,
क्यों कहूँ दुख के आसूँ पीने को?
तू आसूँ ज़रूर बहाना माँ,
मेरी ख़ाक में गुल खिल आएँगे।
और बसंत की चौखट पर,
वो गीत मेरे ही गाएँगे।
ऎसे तेरे आँगन में माँ,
घुट-घुट कर यूँ मरना क्या?
कूद पड़ा जब मैं रण में तो,
जीने से अब डरना क्या?
समय आ गया,चलता हूँ माँ,
सुबह हो रही,अरुण पूरब।
सब जागेंगे अब शायद माँ,
सुबह हो रही,अरुण पूरब।
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