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सुबह हो रही… October 5, 2006

Posted by silentEcho in Rhyme junction.
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सावन के झूले झूल चुका माँ,
मै सलीब पर झूलूँगा अब।
तेरी गोद में सोता था अब तक,
तेरी गोद में सोऊँगा अब।

मौत किसे कहते है माँ?
मैं जाऊँगा अब जीने को।
विचित्र है तू,दुख करती है,
क्यों कहूँ दुख के आसूँ पीने को?

तू आसूँ ज़रूर बहाना माँ,
मेरी ख़ाक में गुल खिल आएँगे।
और बसंत की चौखट पर,
वो गीत मेरे ही गाएँगे।

ऎसे तेरे आँगन में माँ,
घुट-घुट कर यूँ मरना क्या?
कूद पड़ा जब मैं रण में तो,
जीने से अब डरना क्या?

समय आ गया,चलता हूँ माँ,
सुबह हो रही,अरुण पूरब।
सब जागेंगे अब शायद माँ,
सुबह हो रही,अरुण पूरब।

सुनो! पाञ्चजन्य पुकार रहा। October 5, 2006

Posted by silentEcho in Rhyme junction.
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कोई राह नहीं दिखती आगे,
बस फैला कुछ धुआँ-सा है।
उम्मीद बाँधते थे जो पहले,
वे कण्ठ भी रूआँसा हैं।

आँगन में अब भोर कहाँ?
फैला अंधकार ही अंधकार है।
मन में केवल राख है,
और बाकी आसपास गुबार है।

कहीं किसी कोने से पर,
आवाज़ सी सुनाई देती है।
हे अश्रु बहाने वालो सुनो,
धिक्कारती है, क्या कहती है।

धुआँ है!राख में दबी हुई,
कोई लौ अब भी जलती होगी।
और जानो इस गुबार के नीचे,
कोई राह अब भी चलती होगी।

बस कुछ ख़ाक छान लो मित्रों,
आज भले सब काला हो।
कौन कहे -आशा की चिता नहीं,
अलसभोर का उजाला हो।

माना लक्ष्य अदृश्य, दूर कहीं,
पर पुकार रहा, ललकार रहा।
जागो! कूद पड़ो रण में,
सुनो पाञ्चजन्य पुकार रहा।